(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

Aadiparv (Mahabharat) - आदिपर्व (महाभारत)


॥ श्रीः ॥
1.108. अध्यायः 108
Mahabharata - Adi Parva - Chapter Topics
शान्तनुसत्यवतीविवाहः॥ 1 ॥ चित्राङ्गदविचित्रवीर्ययोरुत्पत्तिः॥ 2 ॥ शान्तनुमरणम्॥ 3 ॥ चित्राङ्गदमरणम्॥ 4 ॥ विचित्रवीर्यस्य राज्येऽभिषेकः॥ 5 ॥
Mahabharata - Adi Parva - Chapter Text

वैशम्पायन उवाच। 1-108-0x(665)(4825)
`चेदिराजसुतां ज्ञात्वा दाशराजेन वर्धिताम्।
विवाहं कारयामास शास्त्रदृष्टेन कर्मणा॥' 1-108-1(4826)
ततो विवाहे निर्वृत्ते स राजा शान्तनुर्नृपः।
तां कन्यां रूपसंपन्नां स्वगृहे संन्यवेशयत्॥ 1-108-2(4827)
ततः शान्तनवो धीमान्सत्यवत्यामजायत।
वीरश्चित्राङ्गदो नाम वीर्यवान्पुरुषेश्वरः॥ 1-108-3(4828)
अथापरं महेष्वासं सत्यवत्यां सुतं प्रभुः।
विचित्रवीर्यं राजानं जनयामास वीर्यवान्॥ 1-108-4(4829)
अप्राप्तवति तस्मिंस्तु यौवनं पुरुषर्षभे।
स राजा शान्तनुर्धीमान्कालधर्ममुपेयिवान्॥ 1-108-5(4830)
स्वर्गते शान्तनौ भीष्मश्चित्राङ्गदमरिन्दनम्।
स्थापयामास वै राज्ये सत्यवत्या मते स्थितः॥ 1-108-6(4831)
स तु चित्राङ्गदः शौर्यात्सर्वांश्चिक्षेप पार्थिवान्।
मनुष्यं न हि मेन स कंचित्सदृशमात्मनः॥ 1-108-7(4832)
तं क्षिपन्तं सुरांश्चैव मनुष्यानसुरांस्तथा।
गन्धर्वराजो बलवांस्तुल्यनामाऽभ्ययात्तदा॥ 1-108-8(4833)
गन्धर्व उवाच। 1-108-9x(666)
`त्वं वै सदृशनामासि युद्धं देहि नृपात्मज।
नाम वाऽन्यत्प्रगृह्णीष्व यदि युद्धं न दास्यसि॥ 1-108-9(4834)
त्वयाहं युद्धमिच्छामि त्वत्सकाशं तु नामतः।
आगतोस्मि वृथाऽऽभाष्य न गच्छेन्नाम ते मम॥ 1-108-10(4835)
इत्युक्त्वा गर्जमानौ तौ हिरण्वत्यास्तटं गतौ'।
तेनास्य सुमहद्युद्धं कुरुक्षेत्रे बभूव ह॥ 1-108-11(4836)
तयोर्बलवतोस्तत्र गन्धर्वकुरुमुख्ययोः।
नद्यास्तीरे हिरण्वत्याः समास्तिस्रोऽभवद्रणः॥ 1-108-12(4837)
तस्मिन्विमर्दे तुमुले शस्त्रवर्षसमाकुले।
मायाधिकोऽवधीद्वीरं गन्धर्वः कुरुसत्तमम्॥ 1-108-13(4838)
स हत्वा तु नरश्रेष्ठं चित्राङ्गदमरिन्दमम्।
अन्ताय कृत्वा गन्धर्वो दिवमाचक्रमे ततः॥ 1-108-14(4839)
तस्मिन्पुरुषशार्दूले निहते भूरितेजसि।
भीष्मः शान्तनवो राजा प्रेतकार्याण्यकारयत्॥ 1-108-15(4840)
विचित्रवीर्यं च तदा बालमप्राप्तयौवनम्।
कुरुराज्ये महाबाहुरभ्यषिञ्चदनन्तरम्॥ 1-108-16(4841)
विचित्रवीर्यः स तदा भीष्मस्य वचने स्थितः।
अन्वशासन्महाराज पितृपैतामहं पदम्॥ 1-108-17(4842)
स धर्मशास्त्रकुशलं भीष्मं शान्तनवं नृपः।
पूजयामास धर्मेण स चैनं प्रत्यपालयत्॥ ॥ 1-108-18(4843)

इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि अष्टाधिकशततमोऽध्यायः॥ 108 ॥


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